अन्ना हजारे के पुरे आन्दोलन का एक चरण समाप्त हो चुका है। जन लोकपाल बिल संसद के मानसून सत्र में लोकपाल बिल के रूप में पेश किया जाएगा। इस पुरे आन्देालन को देश भर में आजादी की दूसरी लड़ाई के रूप में प्रचारित किया गया और पुरे देश में जनमत तैयार करने में हमारी मेन स्ट्रीम मीडिया ने हाड़तोड़ मेहनत की है।
कोई भी आन्देालन अपने वास्तविक उद्देश्यों को पुरे संघर्ष के दौरान प्रकाश स्तंभ की तरह दिव्यमान रखता है जिसकी रौशनी में आन्देालन लक्ष्यों को पाने की ओर आगे बढता है। अन्ना के आन्दोलन का लक्ष्य है भ्रष्टाचार की समाप्ति और अन्ना के अनुसार जनलोकपाल बिल इसका उपचार है।
लेकिन भारत में भ्रष्टचार संस्थागत रूप ले चुका है और इसे समाप्त करने के लिए व्यावस्था में नहीं बल्कि पुरे व्यावस्था को ही बदलने की आवश्यकता है। अराजकता का जन्म तभी होता है जब कोई व्यावस्था अपने निर्धारित काम को करना बंद कर देती है। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीनों अंग आज पोलियो के शिकार हो चुके है और आम आदमी के हित सरकार से नही बल्कि बाजार की ताकतो से संचालित हो रहें हैं।
तो ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि अन्ना का आन्दोलन क्या व्यवस्था में परिवर्तन के लिए है या आमूलचूनल परिवर्तन के लिए और यह सवाल ही इस आन्दोलन के स्याह पहलू को उजागर करता है। वास्तव में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चुनावों के माध्यम से लोगो के आक्रेाश एक नियमित अंतराल पर , शांतिपूर्ण तरीके से बाहर आने का रास्ता प्रदान करती है। जिससे जनआन्देालनों के माध्यम से क्रांति की संभावना काफी कम हो जाती है।
लेकिन अभी भारतीय परिस्थितियां भिन्न है। भारत युवा है लेकिन उसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखता है। कमोवेश भारत के आंतरिक हालात वही हैं जिसने मिश्र या ट्यूनीशिया की क्रांति को जन्म दिया है। वैसे परिवर्तनो के लिए भारत में बौद्धिक आधार भी मौजुद है। इसकी छिटपुट अभिव्यक्ति अनेक आन्दोलनों के जरिए हो भी रही है।
ऐसे समय में अन्ना का आन्देालन इस ओर संकेत करता है कि एक हिंसक क्रांति को शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान की जाए। भारतीय असंतोष हिसंक होकर फूटे उससे पहले ही इसे निकलने का रास्ता दे दिया जाए। अतः यह पुरा आन्दोलन राजनीतिज्ञों , कारपोरेट और कारपेारेट मीडिया द्धारा प्रयोजित दिखता है। जो वास्तव में इस लूट की पूरी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं।
अतः भ्रष्टाचार में डूबी इस व्यवस्था के लिए यह सकून की घड़ी है। अन्ना का यह प्रतिकात्मक संघर्ष जनता को कम और सरकार को अधिक राहत देने वाला है। कारपोरेट मीडिया के वे अब दूलारे बन चुके ही है। सरकार लोकपाल बिल में अन्ना के सुझावों को मानने को तैयार है और भ्रष्टाचार जैसे राजनीतिक मुद्दे का अराजनीतिकरण हो चुका है और तथाकथित जनसैलाब, जो रात में कुछ सौ लोगों में सिमट जाता था के दबाव के आड़ में एक क्रांति की भ्रुण हत्या हो चुकी है।



No comments:
Post a Comment