Saturday, 16 April 2011

अन्ना हजारे और एक क्रांति की भ्रुण हत्या



अन्ना हजारे के पुरे आन्दोलन का एक चरण समाप्त हो चुका है। जन लोकपाल बिल संसद के मानसून सत्र में लोकपाल बिल के रूप में पेश किया जाएगा। इस पुरे आन्देालन को देश भर में आजादी की दूसरी लड़ाई के रूप में प्रचारित किया गया और पुरे देश में जनमत तैयार करने में हमारी मेन स्ट्रीम मीडिया ने हाड़तोड़ मेहनत की है।
कोई भी आन्देालन अपने वास्तविक उद्देश्यों को पुरे संघर्ष के दौरान प्रकाश स्तंभ की तरह दिव्यमान रखता है जिसकी रौशनी में आन्देालन लक्ष्यों को पाने की ओर आगे बढता है। अन्ना के आन्दोलन का लक्ष्य है भ्रष्टाचार की समाप्ति और अन्ना के अनुसार जनलोकपाल बिल इसका उपचार है। 
लेकिन भारत में भ्रष्टचार संस्थागत रूप ले चुका है और इसे समाप्त करने के लिए व्यावस्था में नहीं बल्कि पुरे व्यावस्था को ही बदलने की आवश्यकता है। अराजकता का जन्म तभी होता है जब कोई व्यावस्था अपने निर्धारित काम को करना बंद कर देती है। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के तीनों अंग आज पोलियो के शिकार हो चुके है और आम आदमी के हित सरकार से नही बल्कि बाजार की ताकतो से संचालित हो रहें हैं। 
तो ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि अन्ना का आन्दोलन क्या व्यवस्था में परिवर्तन के लिए है या आमूलचूनल परिवर्तन के लिए और यह सवाल ही इस आन्दोलन के स्याह पहलू को उजागर करता है। वास्तव में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली चुनावों के माध्यम से लोगो के आक्रेाश एक नियमित अंतराल पर , शांतिपूर्ण तरीके से बाहर आने का रास्ता प्रदान करती है। जिससे जनआन्देालनों के माध्यम से क्रांति की संभावना काफी कम हो जाती है।
लेकिन अभी भारतीय परिस्थितियां भिन्न है। भारत युवा है लेकिन उसे अपना भविष्य अंधकारमय दिखता है। कमोवेश भारत के आंतरिक हालात वही हैं जिसने मिश्र या ट्यूनीशिया की क्रांति को जन्म दिया है। वैसे परिवर्तनो के लिए भारत में बौद्धिक आधार भी मौजुद है। इसकी छिटपुट अभिव्यक्ति अनेक आन्दोलनों के जरिए हो भी रही है।
ऐसे समय में अन्ना का आन्देालन इस ओर संकेत करता है कि एक हिंसक क्रांति को शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान की जाए। भारतीय असंतोष हिसंक होकर फूटे उससे पहले ही इसे निकलने का रास्ता दे दिया जाए। अतः यह पुरा आन्दोलन राजनीतिज्ञों , कारपोरेट और कारपेारेट मीडिया द्धारा प्रयोजित दिखता है। जो वास्तव में इस लूट की पूरी व्यवस्था को बनाए रखना चाहते हैं। 
अतः भ्रष्टाचार में डूबी इस व्यवस्था के लिए यह सकून की घड़ी है। अन्ना का यह प्रतिकात्मक संघर्ष जनता को कम और सरकार को अधिक राहत देने वाला है। कारपोरेट मीडिया के वे अब दूलारे बन चुके ही है। सरकार लोकपाल बिल में अन्ना के सुझावों को मानने को तैयार है और भ्रष्टाचार जैसे राजनीतिक मुद्दे का अराजनीतिकरण हो चुका है और तथाकथित जनसैलाब, जो रात में कुछ सौ लोगों में सिमट जाता था के दबाव के आड़ में एक क्रांति की भ्रुण हत्या हो चुकी है।

Tuesday, 12 April 2011

मनोहर श्याम जोशी बहुआयामी लेखक

मनोहर श्याम जोशी का अंतिम साक्षात्कार जो प्रसिद्ध पत्रकार अजित राय ने किया था. १९-३-२००६ को यानी उनकी मृत्यु से केवल ११ दिनों पहले. बहुत साफ़गोई के साथ उन्होंने इस बातचीत में अनेक बातें पहली बार ही कही थीं. इसी बहाने उनको थोड़ा याद भी कर लेते हैं. हिंदी के उस बहुआयामी लेखक को.

प्रश्न- आपको साहित्य अकादेमी पुरस्कार की फिर से बधाई. बात यहीं से शुरु करें. साहित्य के लिए आपको बहुत कम पुरस्कार मिले हैं. इतने दिनों बाद इस महत्वपूर्ण पुरस्कार को पाकर कैसा लगा?
जोशीजी- जो मैं कहने जा रहा हूँ उस पर तुम हंसोगे. लेकिन इससे पहले दो बातें. एक, जैसा कि उस दिन साहित्य अकादेमी में अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा भी- कि मेरे मित्र सर्वेश्वर दयाल सक्सेना कहा करते थे, जो लाख समझाने के बावजूद लिखता ही चला जाए उसे कभी-कभी इस ढिठाई के लिए भी पुरस्कृत कर दिया जाता है. तुम ठीक कहते हो, साहित्य का एक यही बड़ा पुरस्कार मुझे मिला है. मुझे खुशी भी हुई. अंततः बात यहाँ टूटती है कि निर्णायक कौन-कौन थे. आम सहमति से फैसला हुआ या नहीं. बहुधा होता यह है कि निर्णायक मंडल में कुछ लोग पहले से तय करके आते हैं कि इस जनम में फलां को पुरस्कार नहीं देंगे.मैं यह इसलिए जानता हूँ कि साहित्य अकादेमी पुरस्कार के निर्णायक मंडल में मैं भी कई बार रहा हूँ. इस चक्कर में कोई तीसरा पुरस्कार पा जाता है. यह अजीब है कि वहां निर्णायक मंडल को अकादेमी एक सूची थमाकर कहती है कि किसी को चुन लो. इस बार हालांकि जिन लोगों ने मेरे नाम का फैसला किया वे तीनों तटस्थ थे, विवादस्पद नहीं थे, उनका कोई पक्ष या नामवर सिंह या अशोक वाजपेयी की तरह कोई गुट नहीं था- नन्दकिशोर आचार्य, गोविंद मिश्र और विश्वनाथ प्रसाद तिवारी.
अब एक किस्सा सुनो. पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक में एक बैंड मास्टर ने कोई अनाम सा पुरस्कार साहित्य, कला, संस्कृति के लिए शुरु किया. बाद में मध्यप्रदेश के एक ट्रांसपोर्टर ने उस पुरस्कार का अधिग्रहण कर लिया. वे कांग्रेस को काफी चंदा देते थे. उन्होंने केंद्र सरकार के दो-दो कैबिनेट मंत्रियों को बुला रखा था पुरस्कार वितरण समारोह के लिए. चूँकि उनमें से एक सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे तो दूरदर्शन, रेडियो और अखबारों के पत्रकारों की भीड़ थी. पुरस्कार में पैसा तो था नहीं, कोई ढंग का प्रतीक चिह्न भी नहीं था. थोक के भाव पुरस्कार बनते. दूरदर्शन समाचारों में मुझे भी दिखाया गया. मित्रों के बड़े फोन आये कि चेक कितने का मिला. पुरस्कार पाने वालों में आस्क उत्तर-छायावादी कवि सम्मेलनी मशहूर कवयित्री भी थी जिनका महत्व सिर्फ इसलिए था कि उनकी दो सुन्दर बेटियां थीं. एक अंग्रेजी अखबार के रिपोर्टर ने मुझसे पूछा कि इस महिला का साहित्य में क्या योगदान है? मैंने जवाब दिया- ये अभी तक जीवित चली आ रही हैं, यह योगदान क्या कम है?’ तो पुरस्कारों की यही हालत है.

प्रश्न- आपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार पाने के बाद अपने वक्तव्य में कहा था- साहित्यकार बन बैठने के बाद मुझे अपना साहित्य और अपनी क्रांतिकारी भूमिका दोनों ही व्यंग्य के पात्र प्रतीत होने लगे.इसका क्या मतलब है? क्या आपका इशारा मार्क्सवादी विचारधारा के असफल या विघटन की ओर है?
जोशीजी- देखो, विचारधारा तो अब भी ठीक है. हमारा खुद को क्रांतिकारी होने का दावा करना पाखंड है. आप अपने रोज़मर्रा के जीवन में सामंती मानसिकता छोड़ नहीं पा रहे हैं और वामपंथी बनते हैं. यह कैसे संभव है? अधिकतर लेखक गांव से दौडकर दिल्ली आ गए, उन्हें भोग की सारी सुविधाएँ- कार, बंगला, पैसा चाहिए था- तो क्रांतिकारिता कैसी? न केवल आचरण क्रांतिकारी नहीं है, बल्कि उनके साहित्य से भी क्रांति नहीं हो रही है. मैं तुम्हें बताऊँ, जैसे हमारे ज़माने में मलयालम में एक नाटक लिखा गया था जिसका शीर्षक था- तुमने मुझे कम्युनिस्ट बना दिया.उस नाटक को देख केरल में हज़ारों लोग कम्युनिस्ट बन गए थे. तुम बताओ, हिंदी में कौन सी ऐसी कृति है जिससे आप हिल जाएँ.

प्रश्न- आपने यह भी कहा है कि मेरी और मेरे मित्रों की प्रयोगधर्मिता पश्चिम से आयात की हुई है और क्रांति कल्पना बुर्जुआ आत्मदया से उपजी भावुकता पर है.
जोशीजी- हिंदी लेखक आम मध्यवर्गीय हिन्दुस्तानी है जिसके पास अपनी दुखद स्मृतियों- माँ गुज़र गई, पिता भले आदमी थे. रघुवीर सहाय ने लिख दिया था न, ‘यही मैं हूँ.तो आप भावुक बुर्जुआ हैं और फ़ालतू का महान होने का दावा कर रहे हैं. आप सीधे-सादे दुनियादारी के धंधे में हैं, आपको फेलोशिप, पुरस्कार, विदेश्यात्राएँ चाहिए. आप बोहेमियन तक तो हो नहीं पाए, क्रांतिकारी होना तो दूर की बात है. आप आधुनिक भी नहीं हो पाए हैं जैसे यूरोप में होते हैं. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना मजाक करता था कि यदि आपने सच-सच संघर्ष लिख दिया तो आपका बायोडाटा डलहो गया. शैलेश मटियानी पश्चिम में होते तो बर्तन मांजने और बकरा काटने के लिए ही पूजे जाते. जब हिंदी लेखकों ने कोई नई खोज वास्तव में की ही नहीं तो गर्व काहे का.
मैं यह नहीं कहता कि पश्चिम में लेखक बड़बोले नहीं होते. पर वे वैसा सचमुच का जीवन जीते हैं. एक तो उन्होंने कुछ नया किया होता है, दूसरे जनता को अधिकार होता है कि वह उसका मजाक उडाये.

प्रश्न- तो क्या यह मान लिया जाए कि हिंदी साहित्य में कोई मौलिक काम नहीं हुआ. नई कहानी, नई कविता, प्रयोगवाद आदि.
जोशीजी- (बीच में रोककर)- बस! बस! बस! क्या बात करते हो? जिसे नई कहानी आंदोलनकहा जाता है, उसके तीन प्रमुख नाम, जिनमें से एक गुज़र गए(मोहन राकेश), दो अभी हैं- राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर(तब वे जिंदा थे). तीनों मेरे मित्र. खुद को स्थापित करने के लिए आंदोलन चलाया, एक दूसरे से श्रेय छीनने के लिए लड़ते रहे. क्या कभी इस आंदोलन का कोई घोषणापत्र छपा? नहीं. नई कविता की बात लो. कैसी नई कविता? क्या इससे जुड़े कवियों ने कभी लिखकर बताया कि उनकी कविता पहले से क्यों और कैसे भिन्न है? जैसे फ़्रांस में कविता में प्रतीकवाद आंदोलन चला तो अब हिंदी में भी प्रतीकवाद. हिंदी लेखकों की सारी प्रयोगधर्मिता पश्चिम से उधार ली गई है.

प्रश्न- हिंदी में आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता, जादुई यथार्थवाद का कोई असर दिखता है?
जोशीजी- जब हिंदी में सही मायने में आधुनिकता और यथार्थवाद ही नहीं आया तो उत्तर-आधुनिकता और जादुई यथार्थवाद कैसे आ सकता है. जैसा कि मैंने पहले कहा, हमारे यहाँ आधुनिकता पश्चिम से आयात की हुई है. आते ही हमारी प्रतिक्रिया दो स्टारों पर हुई. पहली यह कि आधुनिक होने दो हमें क्या करना, हम तो पहले से ही महान हैं. क्या कभी यह आंदोलन होता है कि हम भ्रष्ट हैंहमें आधुनिक हो जान चाहिए. दूसरी प्रतिक्रिया यह कि हम यथार्थ से घबड़ाते रहे पर लोक-आख्यान शैली से भी परहेज़ करते रहे. हमने बीच का रास्ता चुना- आदर्शोन्मुख यथार्थवाद. यानी न आदर्शवादी न यथार्थवादी. हमारे यहाँ संस्कृत का घोंटा लगाये पंडित और मार्क्स का घोंटा लगाए तथाकथित क्रांतिकारी दोनों को स्वीकृति प्राप्त है. यदि कोई लेखक सेक्स की, वेश्याओं की, हिजडों की, समलैंगिकों की बात लिख दे तो उसे दोनों खेमा अस्वीकृत कर देगा. स्वयं मार्क्स की टिप्पणी है कि आदर्श यथास्थितिवादी होता है जसी पर लीपापोती करने से अच्छा है तोड़फोड़ करना.

प्रश्न- आपके लेखन पर अश्लीलता का आरोप लगाया जाता रहा है. खासतौर पर हमजादउपन्यास पर. हालांकि इसे उदयप्रकाश हिंदी का पहला ऐसा महत्वपूर्ण उपन्यास मानते हैं जिसमें पॉपुलर कल्चर की आलोचना की गई है, जो आज हमारे चारों ओर अराजक रूप में पैठ जमा चुका है.
जोशीजी- हमजाद को लिखते समय मेरे दिमाग में आदमी के अस्तित्व को लेकर कई बातें थीं. मैं उसके अँधेरे पक्षों की ओर गया. आदमी के अस्तित्व में ही जो घटियापन, दुष्टता या एविल है, दूसरे रचनाकारों-कलाकारों के भीतर भी एविल है और तीसरे खुद लेखक यानी मैं भी उसका एक पात्र है, जो कहानी कहता है- उसके भीतर भी एविल है, शैतानियत है. हमजाद पर विजयमोहन सिंह ने लिखा- मनोहर श्याम जोशी उन अमेरिकी लेखकों की तरह हैं जो पोर्नलिखकर नाम और पैसा कमाते हैं. मुद्राराक्षस कि सुनिए- भांग की पकौड़ीऔर हमजादमें अंतर नहीं. बटरोही ने हरिया हरक्युलीज़ की हैरानी उपन्यास को धारावाहिक प्रकाशित करने वाली पत्रिका इण्डिया टुडेके संपादक को लिखा- इसे पढकर मुझे उलटी हो गई, बंद कीजिये. मैंने एक पारिवारिक महिला मित्र को उपहार दिया तो उन्होंने पढ़ने के बाद फोन किया- बकवास है.
मैं विद्यानिवास मिश्र जी का बड़ा आदर करता था. उनको हमजाद पढ़ने के लिए दिया. पुस्तक पर लिखकर- बहुत संकोच और भय के साथ.उन्होंने पढ़ने के बाद बहुत गंभीरतापूर्वक कहा- तुम्हें यह नहीं लिखना चाहिए था.मैंने पूछा- क्या उपन्यास अश्लील है?’ उन्होंने कहा- नहीं, पर यह हिंदी भाषी समाज की मानसिकता से मेल नहीं खाता. यदि यह मराठी, बंगला या मलयालम में लिखा गया होता तो ठीक था. मैंने मन ही मन कहा कि यह क्या बात हुई. पर आज मुझे लगता है कि उनकी बात में दम है. हिंदी वाले आज भी चुटकुले, लतीफे, आत्मप्रवंचना ही पसंद करते हैं. कटु बात को स्वीकार नहीं कर सकते. मैं मानता हूँ कि मैंने कुछ भी अश्लील नहीं लिखा. यदि आपका आशय है कि इशारे से भी सेक्स की बात करना अश्लील है, वर्जित है तो मैं इसे नहीं मानता. एक ज़माने में द्वारिका प्रसाद जी के दो उपन्यास इसी कारण चर्चित हो गए थे- मम्मी बिगड़ेगी और घेरे के बाहर’. आप बताइए कि चित्त्कोबरामें ऐसा क्या था कि उसकी लेखिका मृदुला गर्ग को लोग जेल भिजवाने पर तुल गए थे. हम हिंदी वाले क्या कोई दुनिया से न्यारे हैं. मुझे इन आरोपों से ज़रा सी भी परेशानी नहीं. मैं हिंदी में कुछ भी लिख दूँगा तो मुझे कुछ खास मिलना नहीं है- न बड़ा पाठक वर्ग न पैसा. मुझे हिंदी की सीमा का पता है.



Wednesday, 6 April 2011

ये नये मिज़ाज का शहर है






यूँ ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर भी रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो


कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से 
ये नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो


अभी राह में कई मोड़ हैं कोई आयेगा कोई जायेगा
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ कर


मुझे इश्तहार-सी लगती हैं ये मुहब्बतों की कहानियाँ
जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो


कभी हुस्ने परदा नशीं भी हो ज़रा आशिक़ाना लिबास में 
जो मैं बन सँवर के कहीं चलूँ मिरे साथ तुम भी चला करो


नहीं बे हिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर न हो
उसे इतनी गरमि-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो

 
ये ख़िज़ाँ की ज़र्द-सी शाल में जो उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है इसे आँसुओं से हरा करो


                          बशीर बद्र


                       मीडिया-मुग़ल: रूपर्ट मर्डोक


ऑस्ट्रेलिया में जन्मे रूपर्ट मर्डोक विश्वविख्यात मीडिया-मुग़ल हैं। उनका जन्म मेलबोर्न में 11 मार्च, 1931 को हुआ था, लेकिन अपनी व्यावसायिक महत्वाकांक्षा और अमेरिका में अपने व्यावसायिक विस्तार के लिए उन्होंने सन 1985 में अमेरिकी नागरिकता हासिल कर ली। उनके पिता कीथ मर्डोक ऑस्ट्रेलिया के एक स्थानीय समाचार-पत्र के मालिक थे । रूपर्ट के पिता ने उनकी कम उम्र में ही शादी कर दी थी। शादी के बाद वे पढ़ाई के लिए इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय चले गए। यहां उन्होंने राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। सन 1952 में, जब रूपर्ट 21 साल के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया और उन्हें पिता का कारोबार संभालने के लिए वापस ऑस्ट्रेलिया आना पड़ा। उन्हें पिता की विरासत के रूप में उनके समाचार पत्र का स्वामित्व मिला और सन 1953 में न्यूज़ लिमिटेड के प्रबंध निदेशक बने । कारोबार की शुरुआत से ही उन्होंने अधिग्रहण और विस्तारवादी नीति अपनाई। उन्होंने सफलता के लिए अख़बारों की टेबलॉयड संस्कृति से भी परहेज़ नहीं किया। जल्दी ही उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के कई प्रांतों के स्थानीय अख़बारों का अधिग्रहण कर लिया। सन 1960 तक उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के ‘Cumberland Newspapers’ और ‘Mirror Newspapers Ltd.’ समाचार-पत्र ख़रीदकर अपने समाचार कारोबार का विस्तार कर लिया था
सन 1964 में मर्डोक ने ऑस्ट्रेलिया का पहला राष्ट्रीय अख़बार दि ऑस्ट्रेलियन शुरू किया। अपने मीडिया साम्राज्य की स्थापना के लिए रूपर्ट मर्डोक ने ऑस्ट्रेलिया की राजनीति का भी जमकर लाभ उठाया और इसके लिए अवसरवादी प्रवृत्ति अपनाने से भी नहीं चूके1960 के दशक के अंत में उन्होंने अपना बिज़नेस ब्रिटेन में फैलाना शुरू किया। कॉमनवेल्थ बैंक से उन्हें इस काम में बहुत मदद मिली। 1969 में ब्रिटेन का सबसे ज़्यादा सर्कुलेशन वाला रविवारीय समाचार पत्र न्यूज़ ऑफ़ दि वर्ल्ड ख़रीद लिया। इसी वर्ष जब मिरर ग्रुप अपने समाचार पत्र दि सन को चलाने में असमर्थ हुए तो रूपर्ट ने उसे भी ख़रीद लिया और एक टेबलॉयड की शक़्ल दे कर उसे सफ़ल बना दिया।सन 1979 में उन्होंने मेलबोर्न टेलीविज़न स्टेशन ख़रीद लिया।
सन 1973 में रूपर्ट मर्डोक ने अमेरिका में अपने पहला अधिग्रहण किया जब उन्होंने सेंट एंटोनियो समाचार ख़रीदा। सन 1974 में दि नेशनल स्टार शुरू करके रूपर्ट ने यहाँ सुपर मार्केट टेबलॉयड कारोबार में प्रवेश किया। 4 सितंबर, 1985 में रूपर्ट मर्डोक ने अमेरिकी नागरिकता ले ली, जिससे अमेरिका में मीडिया ग्रुप्स और टेलीविज़न स्टेशन ख़रीदे जा सकें। सन 1997 में उन्होंनेन्यूयॉर्क पोस्ट ख़रीद लिया
 सन 1980 में रूपर्ट मर्डोक ने विश्व प्रसिद्ध न्यूज़ कॉर्पोरेशन का गठन किया। कई देशों सहित केमैन द्वीप समूह, चैनल द्वीप समूह, वर्जिन द्वीप समूह और बहामास में भी न्यूज़ कॉर्पोरेशन ने अपने सहयोगी बनाए। सन 1981 में लंदन केटाइम्स और सनडे टाइम्स पर अधिकार कर लिया। सन 1982 ऑस्ट्रेलियन बुक प्रकाशन ऑगस एंड रॉबर्टसन ख़रीद लिया।  
सन 1983 में उन्होंने पहला उपग्रह चैनल स्काई लॉन्च किया। 1990 में मर्डोक प्रतिद्वंद्वी कंपनी ब्रिटिश सेटेलाइट ब्रॉडकास्ट का अपनी ब्रिटिश बेस्ड सेटेलाइट नेटवर्क द स्काई में विलय कराने में सफल रहे। परिणाम स्वरूप बनी कंपनी बी स्काई बी ने ब्रिटिश पे टेलीविज़न मार्केट पर अपना प्रभुत्व क़ायम कर लिया। सन 1986 में उन्होंने फ़ॉक्स ब्रॉडकास्टिंग कंपनी की स्थापना की 

इस साल तक आते-आते न्यूज़ कॉर्पोरेशन दुनिया में सबसे बड़ा समाचार-पत्र प्रकाशक बन गया सन 1993 में रूपर्ट मर्डोक ने एशिया के मार्केट में प्रवेश किया। न्यूज़ कॉर्पोरेशन ने रिचर्ड ली द्वारा स्थापित हॉन्ग-कॉन्ग की कंपनी सेटेलाइट टेलीविज़न फ़ॉर एशियन रीजन (स्टार)’ का अधिग्रहण कर लिया। एशिया भर के 53 देशों में ये 30 करोड़ दर्शकों तक इसकी पहुँच है। भारत में भी इसके तहत अनेक चैनल चल रहे हैं। अपनी आक्रामक नीति के रूपर्ट मर्डोक ने उस समय भारत में दूरदर्शन के कुछ बड़े अधिकारियों जैसे रतिकांत बसु आदि को तोड़कर भारी वेतन पर स्टार में ले आए।
1998  स्टार न्यूज़शुरू करने का फ़ैसला किया। इसके लिए कंटेंट निर्माण की ज़िम्मेदारी प्रसिद्ध पत्रकार प्रणव राय के प्रोडक्शन हाउसएन.डी.टी.वी को दी गई। इसकी एक वजह भारत सरकार की रुपर्ट मर्डोक को लेकर आशंका भी थी। रूपर्ट मर्डोक राजनीति में दख़लअंदाज़ी के लिए जाने जाते थे। उनके पहली बार भारत आगमन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने उनसे कहा था,-आशा करता हूँ कि आप भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने की कोई योजना नहीं रखते हैं। 31 मार्च, 2003को स्टार न्यूज़ को नए कलेवर और नए मैनेजमेंट के साथ 24 घंटे के हिन्दी न्यूज़ चैनल के रूप में रीलॉन्च किया गया। सन 2005 में रूपर्ट मर्डोक को केन्द्र सरकार की नीति के चलते स्टार न्यूज़ के 74 प्रतिशतशेयर पश्चिम बंगाल के आनंद बाज़ार पत्रिका समूह(ए.बी.पी. ग्रुप्स) को बेचने पड़े। इस नए संयुक्त उद्यम के तहत मीडिया कंटेंट एंड कम्युनिकेशन सर्विसेज़(एम.सी.सी.एस.) नामक कंपनी भारत में स्टार न्यूज़ का प्रसारण कर रही है।