वास्तव में अर्थशास्त्रियों के नजरीये से देखा जाए तो सब्सिडी अनिवार्य रूप से बाजार और प्रतिस्पर्धा को विकृत करती है।सब्सिडी के लाभ केवल लक्षित समूह ही नहीं बल्कि अन्य वे लोग जिन्हें सब्सिडी की जरूरत नहीं है वे भी उठाते हैं।सोणावणे केस स्पष्ट संकेत है कि भारत में सब्सिडी लक्षित समूहों तक नहीं पहुंच रही है। वस्तुतः लोककल्याणकारी राज्य की अवधारण के तहत राज्य का दाइत्व होता है कि वह लोगों को वस्तु और सेवाएं प्रदान करे और संभवतः यही अवधारणा सब्सिडी के वैचारिक आधार का निमार्ण करती है।कैश ट्रान्सफर की यह नयी व्यवस्था सरकार के इस दाइत्व को कम करती है।लेकिन कैश ट्रान्सफर किसी व्यक्ति को अपनी जरूरतों के अनुसार संसाधनो की उपलब्धता सुनिश्चित करने का अवसर भी प्रदान करता है और यदि यह नियमित हो(जैसे प्रत्येक महिनें) तो इसे घरेलू बजट में शामिल किया जा सकता है और इसके आधार पर जरूरतों को समायोजित किया जा सकता है।लेकिन भारत में कैश ट्रान्सफार की व्यवस्था लागू करने के मार्ग में अनेक बाधाएं हैं।इससे जुड़ी पहली चिंता है कि भारत की बेकाबू मुद्रास्फिति कैश ट्रान्सफर के महत्व को समाप्त कर देगी। इसके लिए जरूरी है कि सरकार कैश ट्रान्सफर को मुद्रास्फिति के साथ इंडेक्स करे।
कैश ट्रान्सफर के लिए लक्षित समूहों का निर्धारण एक बड़ी चुनौती होगी।किन लोगों को सम्मिलित किया जाए और किनको बाहर रखा जाए इसका निर्धारण भारत में लोगों के आर्थिक स्तर से नहीं बल्कि राजनीति से सुनिश्चित होता है और इसमें एक व्यापक दृष्टिकोण की स्पष्ट कमी दिखती है।
इस कैश का ट्रांस्फर किस प्रकार से होगा?वैसे तो सरकार की योजना है कि यह बैंको के माध्यम से होगा और विशिष्ट पहचान योजना के साथ भी इसे जोड़ा जाएगा।लेकिन भारत में बैंकिंग घनत्व काफी कम है और दूरदराज के क्षेत्रों में जहां नगद सहायता की सबसे अधिक आवश्यकता है ,जाहिर है वहां बैंकिंग व्यवसथा की कमी से यह योजना भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की भेंट चढ सकती है। भारत में पेास्ट आफिस बैंकों के विकल्प हो सकते हैं।अन्य विकासशील देशों में जहां कैश ट्रांस्फर की व्यवस्था है वहां पर भी नगद भुगतान गैर बैंकिंग संस्थानों जैसे डाकघर ,लाटरी बिक्री घर या मोबाईल कैश मशीन के माध्यम से किया जाता है।
ब्राजील के अनुभव से पता चलता है कि कैश ट्रान्सफर योजना का शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभाव अलग अलग रहा है।भारत में जहां ग्रामीण निर्धनों की संख्या अधिक है वहां इस प्रश्न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि क्या इस योजना से देानो समान रूप से लाभांवित होंगे। एक संशय यह भी है कि इस कैश का इस्तेमाल किस तरह हो।सेल्फ इंप्लावड् वुमेंस ऐसोसिएसन के 2009 के सर्वे में 56 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि भोजन को छोड़ कर अन्य उपभेाग में यह खर्च होगा जो कि चिंता की बात है।
बहरहाल, कैश ट्रान्सफर अंतर्राष्ट्रिय आर्थिक विकास संस्थाओं के लिए एक नये शगल के रूप में उभर रहा है और गरीबी उन्मूलन में इसे एक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। भारत में इस योजना की राह कैसी होगी इसका संकेत दिल्ली सरकार की ऐसी ही एक योजना के विरोध से पता चलता है।
jankariyon se bhara article likhane ke liye dhanyvad
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